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Friday, May 24, 2019

StD 12 Result



Education began in prehistory, as adults trained the young in the knowledge and skills deemed necessary in their society. In pre-literate societies, this was achieved orally and through imitation. Story-telling passed knowledge, values, and skills from one generation to the next. As cultures began to extend their knowledge beyond skills that could be readily learned through imitation, formal education developed. Schools existed in Egypt at the time of the Middle Kingdom. Plato founded the Academy in Athens, the first institution of higher learning in Europe.
The city of Alexandria in Egypt, established in 330 BCE, became the successor to Athens as the intellectual cradle of Ancient Greece. There, the great Library of Alexandria was built in the 3rd century BCE. European civilizations suffered a collapse of literacy and organization following the fall of Rome in CE 476. In China, Confucius (551-479 BCE), of the State of Lu, was the country's most influential ancient philosopher, whose educational outlook continues to influence the societies of China and neighbours like Korea, Japan, and Vietnam. Confucius gathered disciples and searched in vain for a ruler who would adopt his ideals for good governance, but his Analects were written down by followers and have continued to influence education in East Asia into the modern era. The Aztecs also had a well developed theory .





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Wednesday, May 22, 2019

GPSC importnant News

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Education began in prehistory, as adults trained the young in the knowledge and skills deemed necessary in their society. In pre-literate societies, this was achieved orally and through imitation. Story-telling passed knowledge, values, and skills from one generation to the next. As cultures began to extend their knowledge beyond skills that could be readily learned through imitation, formal education developed. Schools existed in Egypt at the time of the Middle Kingdom. Plato founded the Academy in Athens, the first institution of higher learning in Europe.
The city of Alexandria in Egypt, established in 330 BCE, became the successor to Athens as the intellectual cradle of Ancient Greece. There, the great Library of Alexandria was built in the 3rd century BCE. European civilizations suffered a collapse of literacy and organization following the fall of Rome in CE 476. In China, Confucius (551-479 BCE), of the State of Lu, was the country's most influential ancient philosopher, whose educational outlook continues to influence the societies of China and neighbours like Korea, Japan, and Vietnam. Confucius gathered disciples and searched in vain for a ruler who would adopt his ideals for good governance, but his Analects were written down by followers and have continued to influence education in East Asia into the modern era. The Aztecs also had a well developed theory .

Tuesday, May 21, 2019

Call Center

Education began in prehistory, as adults trained the young in the knowledge and skills deemed necessary in their society. In pre-literate societies, this was achieved orally and through imitation. Story-telling passed knowledge, values, and skills from one generation to the next. As cultures began to extend their knowledge beyond skills that could be readily learned through imitation, formal education developed. Schools existed in Egypt at the time of the Middle Kingdom. Plato founded the Academy in Athens, the first institution of higher learning in Europe.
The city of Alexandria in Egypt, established in 330 BCE, became the successor to Athens as the intellectual cradle of Ancient Greece. There, the great Library of Alexandria was built in the 3rd century BCE. European civilizations suffered a collapse of literacy and organization following the fall of Rome in CE 476. In China, Confucius (551-479 BCE), of the State of Lu, was the country's most influential ancient philosopher, whose educational outlook continues to influence the societies of China and neighbours like Korea, Japan, and Vietnam. Confucius gathered disciples and searched in vain for a ruler who would adopt his ideals for good governance, but his Analects were written down by followers and have continued to influence education in East Asia into the modern era. The Aztecs also had a well developed theory .

Thursday, May 16, 2019

MAHARANA PRATAP

मेवाड का वीर योद्धा महाराणा प्रताप

         मेवाड का वीर योद्धा महाराणा प्रताप 



                   



                     महाराणा प्रताप सिंह ( ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत १५९७ तदनुसार ९ मई १५४०–१९ जनवरी १५९७) उदयपुर, मेेेेवाााड में| सिसोदिया आदिवासी भील राजवंश]] के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया। उनका जन्म राजस्थान के कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जयवंत कँवर के घर हुआ था। लेखक विजय नाहर के अनुसार महाराणा प्रताप की जन्मकुंडली और उस काल की परिस्थितियां एवं भील समाज की परंपरा के आधार पर महाराणा प्रताप का जन्म उनके ननिहाल पाली मारवाड़ में हुआ। १५७६ के हल्दीघाटी युद्ध में २०,००० भीलो को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के ८०,००० की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने आपना अश्व दे कर महाराणा को बचाया। प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें १७,००० लोग मारे गए। मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। महाराणा की हालत दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती चली गई । २५,००० आदिवासीयो को १२ साल तक चले उतना अनुदान देकर भामाशाह भी अमर हुआ।

((महाराणा प्रताप सिंह)) 

      
शासन
१५७२ – १५९७

राज तिलक
२८ फ़रवरी १५७२

पूरा नाम
महाराणा प्रताप सिंह भील

पूर्वाधिकारी
उदयसिंह द्वितीय

उत्तराधिकारी
महाराणा अमर सिंह[1]

जीवन संगी
(11 पत्नियाँ)[2]

संतान
अमर सिंह
भगवान दास
(17 पुत्र)

राज घराना
सिसोदिया

पिता
उदयसिंह द्वितीय

माता
महाराणी जयवंताबाई

धर्म
सनातन धर्म


{{{जीवन}}}


                                

चेतक पर सवार राणा प्रताप की प्रतिमा (महाराणा प्रताप स्मारक समिति, मोती मगरी , उदयपुर। 


     
बिरला मंदिर, दिल्ली,  महाराणा प्रताप का शैल चित्र

महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ दुुुुर्ग में हुआ था। महाराणा प्रताप की माता का नाम जयवंता बाई था, जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थी। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था।
राणा उदयसिंह केे दूसरी रानी धीरबाई जिसे राज्य के इतिहास में रानी भटियाणी के नाम से जाना जाता है, यह अपने पुत्र कुंवर जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी | प्रताप केे उत्तराधिकारी होने पर इसकेे विरोध स्वरूप जगमाल अकबर केे खेमे में चला जाता है |
महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक मेंं 28 फरवरी, 1572 मेंगोगुंदा में होता हैै, लेकिन विधि विधानस्वरूप राणा प्रताप का द्वितीय राज्याभिषेक 1572 ई. में ही कुंंभलगढ दुुुुर्ग में हुआ, दूूूसरे राज्याभिषेक में जोधपुर का राठौड़ शासक राव चंद्रसेनभी उपस्थित थे |
राणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल ११ शादियाँ की थी उनके पत्नियों और उनसे प्राप्त उनके पुत्रों पुत्रियों के नाम है:-
  1. महारानी अजब्धे पंवार :- अमरसिंह और भगवानदास
  2. अमरबाई राठौर :- नत्था
  3. शहमति बाई हाडा :-पुरा
  4. अलमदेबाई चौहान:- जसवंत सिंह
  5. रत्नावती बाई परमार :-माल,गज,क्लिंगु
  6. लखाबाई :- रायभाना
  7. जसोबाई चौहान :-कल्याणदास
  8. चंपाबाई जंथी :- कल्ला, सनवालदास और दुर्जन सिंह
  9. सोलनखिनीपुर बाई :- साशा और गोपाल
  10. फूलबाई राठौर :-चंदा और शिखा
  11. खीचर आशाबाई :- हत्थी और राम सिंह
महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गया, इसी क्रम मानसिंह(1573 ई. में ), भगवान दाास( सितम्बर, 1573 ई. में ) तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और हमें हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध देखने को मिला |

    हल्दीघाटी का युद्ध

    यह युद्ध १८ जून १५७६ ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे-हकिम खां सूरी
    इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया। इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर' भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गया। ,[2]
    इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजय नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर एेसा कुछ नहीं हुआ, ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।
    दिवेेेेर का युुद्ध
    राजस्थान के इतिहास 1582 में दिवेर का युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में राणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ती हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, जिसके कारण कर्नल जेम्स टाॅड ने इस युद्ध को "मेवाड़ का मैराथन" कहा |
    सफलता और अवसान
    .पू. 1579 से 1585 तक पूर्व उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उल्झा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने 1585ई. में मेवाड़ मुक्ति प्रयत्नों को और भी तेज कर लिया। महाराणा की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरंत ही उदयपूर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया , उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था , पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत 1585 ई. में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए,परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चांवड में उनकी मृत्यु हो गई।
    महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सीधरने के बाद अागरा ले आया।
    'एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए। 

      {{  महाराणा प्रताप सिंह के मृत्यु पर अकबर  प्रतिक्रिया  

            अकबर महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु था, पर उनकी यह लड़ाई कोई व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम नहीं थी, हालांकि अपने सिद्धांतों और मूल्यों की लड़ाई थी। एक वह था जो अपने क्रूर साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था , जब की एक तरफ ये थे जो अपनी भारत मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जनता था की महाराणा जैसा वीर कोई नहीं है इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आंसू आ गए।
    महाराणा प्रताप के स्वर्गावसान के समय अकबर लाहौर में था और वहीं उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है। अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है:-
    अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी
    गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी
    नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली
    न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली
    गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी
    निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी
    अर्थात्
    हे गेहलोत राणा प्रतापसिंघ तेरी मृत्यु पर शाह यानि सम्राट ने दांतों के बीच जीभ दबाई और निश्वास के साथ आंसू टपकाए। क्योंकि तूने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया। तूने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि तू अपना आडा यानि यश या राज्य तो गंवा गया लेकिन फिर भी तू अपने राज्य के धुरे को बांए कंधे से ही चलाता रहा। तेरी रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही तू खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गया। तू कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहा और तेरा रौब दुनिया पर निरंतर बना रहा। इसलिए मैं कहता हूं कि तू सब तरह से जीत गया और बादशाह हार गया।
    अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना पूरा जीवन का बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और उनके स्वामिभक्त अश्व चेतक को शत-शत कोटि-कोटि प्रणाम।

                          

     फिल्म एवं साहित्य में


    पहले पहल 1946 में जयंत देसाई के निर्देशन में महाराणा प्रताप नाम से श्वेत-श्याम फिल्म बनी थी। 2013 में सोनी टीवी ने 'भारत का वीर पुत्र – महाराणा प्रताप' नाम से धारावाहिक प्रसारित किया था जिसमें बाल कुंवर प्रताप का पात्र फैसल खान और महाराणा प्रताप का पात्र शरद मल्होत्रा ने निभाया था।

                                  कुछ महत्वपूर्ण तथ्य


    इतिहासकार विजय नाहर की पुस्तक हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप के अनुसार कुछ तथ्य उजागर हुई।[5]
    1.महाराणा उदय सिंह ने युद्ध की नयी पद्धति -छापा मार युद्ध प्रणाली इजाद की। वे स्वयं तो इसका प्रयोग नहीं कर सके परन्तु महाराणा प्रताप ,महाराणा राज सिंह एवं छत्रपति शिवाजी महाराज ने इसका सफल प्रयोग करते हुए मुगलों पर सफलता प्राप्त की ।
    2.महाराणा प्रताप मुग़ल सम्राट अकबर से नहीं हारे । उसे एवं उसके सेनापतियो को धुल चटाई । हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप जीते|
    3.ऐसा कुअवसर प्रताप के जीवन में कभी नहीं आया कि उसे घांस की रोटी खानी पड़ी अकबर को संधि के लिए पत्र लिखना पड़ा हो।अपने उतरार्ध के बारह वर्ष सम्पूर्ण मेवाड़ पर शुशाशन स्थापित करते हुए उन्नत जीवन दिया ।

    Saturday, May 11, 2019

    New Bharati..

    Education began in prehistory, as adults trained the young in the knowledge and skills deemed necessary in their society. In pre-literate societies, this was achieved orally and through imitation. Story-telling passed knowledge, values, and skills from one generation to the next. As cultures began to extend their knowledge beyond skills that could be readily learned through imitation, formal education developed. Schools existed in Egypt at the time of the Middle Kingdom. Plato founded the Academy in Athens, the first institution of higher learning in Europe.
    The city of Alexandria in Egypt, established in 330 BCE, became the successor to Athens as the intellectual cradle of Ancient Greece. There, the great Library of Alexandria was built in the 3rd century BCE. European civilizations suffered a collapse of literacy and organization following the fall of Rome in CE 476. In China, Confucius (551-479 BCE), of the State of Lu, was the country's most influential ancient philosopher, whose educational outlook continues to influence the societies of China and neighbours like Korea, Japan, and Vietnam. Confucius gathered disciples and searched in vain for a ruler who would adopt his ideals for good governance, but his Analects were written down by followers and have continued to influence education in East Asia into the modern era. The Aztecs also had a well developed theory .

    Sunday, May 5, 2019

    BiRD VOIce

    Education began in prehistory, as adults trained the young in the knowledge and skills deemed necessary in their society. In pre-literate societies, this was achieved orally and through imitation. Story-telling passed knowledge, values, and skills from one generation to the next. As cultures began to extend their knowledge beyond skills that could be readily learned through imitation, formal education developed. Schools existed in Egypt at the time of the Middle Kingdom. Plato founded the Academy in Athens, the first institution of higher learning in Europe.
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    Thursday, May 2, 2019

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